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शुक्रवार, 3 जून 2016

किस्से-कहानियाँ |

अगर कोई अमेरिकन पूछता है कि तुम्हें अमेरिका में क्या पसन्द है तो समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ पर ख़तम। यहाँ पर बुरा लगने जैसा तो कुछ है ही नहीं। सबकुछ अच्छा ही लगता है। यहाँ पर अपार्टमेंट में बीच-बीच में इंस्पेक्शन होते रहते हैं जिसमे जाँच करने वाले लोग देखते हैं कि घर के सारे उपकरण सही से कार्य कर भी रहे हैं या नहीं। प्रमुख रूप से अग्नि चेतावनी की घंटी (fire alarm) को जाँचा जाता है। यहाँ पर मकान लकड़ी के बने होते हैं जिसके कारण थोड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है। यह लोग सूचना देकर ही घर पर आते हैं।
आज मेरी यूनिट में इंस्पेक्शन था। एक दिन पहले मुझे नोटिस मिल गया था कि वह लोग कल आने वाले हैं। सवेरे से थोड़ा बहुत घर साफ़ किया, आखिर हूँ तो मैं भारतीय ही :) घर तभी सही से साफ़ होता है जब कोई मेहमान आने वाला हो। यहाँ पर नोटिस वाला सिस्टम बहुत अच्छा है। अवसर कोई भी हो एक नोटिस आपके दरवाज़े में चिपका ही देते हैं जैसे-
यह तब, जब उन्हें आपके घर में नहीं आना होता। 
घर में आने के लिए कुछ ऐसा नोटिस होता है। 
यह मेरा प्रिय नोटिस है। 
हर महीने नऐ फन फैक्ट्स के साथ ऐसा नोटिस देखने को भी मिलता है। जो मुझे सबसे ज़ादा पसंद है। खैर बात तो इंस्पेक्शन की चल रही थी। दरवाज़े की घण्टी बजी.......मैंने बाल्कनी  से देखा तो एक जाँचकर्ता हाथ में कुछ पन्ने लिए खड़ा था। आप सोच रहे होंगे मैंने बालकनी से क्यों देखा? सीधे दरवाज़ा क्यों नहीं खोला? इसका जवाब भी है मेरे पास।

अब आप समझ ही गए होंगे कि जब-जब मैं इन सीड़ियों को देखती हूँ तो थोड़ी हैरान-परेशान सी हो जाती हूँ। जब भी घण्टी बजती है तो छोटे- मोटे काम में अपनी बालकनी से ही निपटा लेती हूँ। पर यह काम बालकनी से निपटने वाला नहीं था। इसके लिए मुझे नीचे जाना ही पड़ा।

यहाँ के लोग बहुत बातूनी होते हैं जितना काम करते हैं उतनी ही बातें। जाँचकर्ता से आज बड़ी मज़ेदार बातें हुईं। घर के अन्दर आते ही उसने मुझसे कहा-"मसाले की खुशबू आ रही है क्या बनाया है लंच में? " जानते हुए भी मैं एक पल के लिए गड़बड़ा गई कि मसाला हिंदी का शब्द है या इंग्लिश का.....फिर मैंने उसे समझाया कि मैंने आज दाल-चावल बनाया है।

उसका दूसरा प्रश्न था, "आप कहाँ से हैं ?" मैंने उसे बताया कि मैं भारत से हूँ।" फिर उसने पूछा मेरी फर्स्ट लैंग्वेज क्या है? क्योंकि भारत में तो बहुत सी भाषाऐं बोली जाती हैं। मैंने भी गर्व से बोला हिंदी।अब वह मुझसे हिंदी में कुछ सुनना चाहता था। वह जानना चाहता था कि हिन्दी सुनने में कैसी लगती है। मैंने उसे बोला आप कुछ इंग्लिश में बोलिए और मैं उसे हिंदी में ट्रांसलेट करती हूँ। सोचिऐ उसने क्या बोल होगा? उसने बोला "Dogs are cool" और मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखने लगा। अब वह मेरे जवाब का इंतजार कर रहा था और मैं मन ही मन सोच रही थी कि इसे मेरे मुँह से कुत्ता शब्द ही सुनना था। मैंने भी मुस्कुराते हुऐ बोला कुत्ते अच्छे होते हैं। वह मेरे पीछे-पीछे बोला, " खुट्टे अट्टे होटे हे" हा हा हा.....सच कहूँ तो उसके मुँह से हिन्दी सुनने में बहुत मज़ेदार लग रही थी। क्या करें हमारी भाषा है ही इतनी अच्छी कोई भी बोले क्यूट ही लगती है। मैंने उसे बताया जैसे आप लोग hi/hello बोलते हो वैसे ही हम लोग नमस्ते बोलते हैं और भी बहुत सी बातें मैंने उसे बताई। बन्दा हिन्दी भाषा से ऐसा प्रभावित हुआ कि जाते समय ख़ुद से ही दरवाज़ा लॉक करके चला गया और मुझ आलसी की नीचे जाने वाली मेहनत बच गई। 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

डेथ वैली

मैंने रोडीज़ के किसी एक एपिसोड में इस जगह को देखा था। तब सोचा नहीं था कि कभी मैं भी यहाँ जाऊँगी। प्लान तो हमारा वेगस जाने का बन रहा था पर जैसे ही मुझे पता चला कि डेथ वैली वेगस जाने वाले रस्ते मैं ही पड़ता है तो मैंने वहां जाने की ज़िद पकड़ ली। वैसे मेरे पति बहुत प्यारे हैं। मेरी हर बात मान लेते हैं। बस थोड़ी ज़िद करने की देरी होती है :) ।

सप्ताह के अंत में हम लोग अक्सर कहीं न कहीं घूमने निकल ही पड़ते थे। इस बार वेगस जाना था तो उत्साह कुछ ज्यादा ही था। मैंने तो रात से ही अपना सारा सामान, जो मुझे लेकर जाना था, एक किनारे में रख लिया था। अभी आप सोच रहे होंगे कि किनारे में क्यों रखा बैग में रखना चाहिए था लेकिन में आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की मेरे पति को सामान खुद से रखने की बीमारी है अगर कभी मैं गलती से सामान रख देती हूँ तो ये दुबारा से उसे निकाल कर खुद से रखने लगते हैं। हमें शुक्रवार की शाम को निकलना था। हम चार लोग थे - मैं ,मेरे पति, इनके दोस्त और उनकी पत्नी। हम चारों ने यह तय किया था कि रात का भोजन करके ही निकलेंगे। १४ घंटे की ड्राइविंग थी। सबसे ज़्यादा खुश में ही थी क्योंकि ये तीनों लोग पहले भी वेगस गए थे। एक मैं ही थी जिसने वेगस नहीं देखा था। रात का सफर कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला। कुछ समय हमारा अन्ताक्षरी खेलने में निकला तो कुछ समय खानेऔर सोने में। मुझे आज भी याद है उन दिनों आशिकी-२ के गाने बहुत चल रहे थे। 
मुझे तो अच्छे लगते थे पर इनको कुछ खास पसंद नहीं थे फिर भी कभी मैं लगाती थी तो सुन लेते थे। उस दिन भी गाड़ी में इसी के गाने चल रहे थे। कुछ दिन तो ये सुनते रहे पर जब चौथे दिन हमलोग वापस लौट रहे थे तो ये गाना बहुत देर से बज रहा था "सुन रहा है ना तू ,रो रही हूँ  मैं" ये धीरे से बोले रो मत, मर जा। हा हा हा ! यह शब्द कहना पता नहीं ठीक होगा कि नहीं पर ये सच में "झेल" गए थे।

रात भर ड्राइव करते रहे और जब थोड़ा उजाला सा होने लगा तो इस जगह रुक कर हमने ब्रश किया और मुँह धो कर आगे बड़े।

क्या सड़कें हैं यहाँ की पता नहीं ऐसी सड़कें अपने देश मैं कब बनेंगीं।  

सवेरे ६ बजे हमलोग डेथ वैली पहुँचे।अच्छा-खासा उजाला हो गया था । बहुत सुन्दर नज़ारा था ऐसा नज़ारा मैंने पहले कभी नहीं देखा था।रेत के टीलों में सूरज की किरणें ऐसे पड़ रही थी मानों हीरे की खदान पृथ्वी कि सतह पर निकल कर आगई हो। टीवी में मैंने जो देखा था उससे तो बहुत अधिक सुन्दर था। जैसे ही हमलोग कैमरा लेकर गाड़ी से बाहर निकले १५ मिनट के लिए भी बाहर रह नहीं पाऐ। बहुत गरम था विश्वास नहीं हो रहा था कि सुबह-सुबह इतना गरम कैसे हो सकता है? शायद इसी लिए इसका नाम डेथ वैली पड़ा।मुझे लगता है कि कोई न कोई तो पक्का भगवान जी को प्यारा हुआ होगा यहाँ। ऐसे ही तो डेथ वैली नहीं बोलेंगे इसे। खैर कारण कुछ भी हो पर यह नार्थ अमरीका का सबसे गरम, सबसे सूखा व सबसे निचला स्थान है।


बाद में मैंने इंटरनेट में देखा तो पता चला १० जुलाई १९१३ में यहाँ का तापमान 134 डिग्री F माने 56 डिग्री C दर्ज किया गया था जोकि इस दुनिया में अब तक का सबसे ज़्यादा तापमान माना जाता है। जिस दिन हमलोग यहाँ गऐ थे उस दिन भी तापमान कुछ ज़्यादा ही बढ़ा हुआ था। अब आप सोच रहे होंगे आखिर कितना बढ़ सकता है-100,110 या 120? उस दिन का तापमान 127 डिग्री F रिकॉर्ड किया गया था।अच्छा ही हुआ हमलोग जल्दी चले गए वरना मेरा तो पिघलना पक्का था। :) यहाँ पर साल में २ इंच से भी कम वर्षा होती हैऔर यह स्थान समुद्र तल से 282 फ़ीट नीचे है।


 जैसे-जैसे हम रेत में आगे बड़ते रहे वैसे-वैसे जमीन में खुदे ये पट्टे हमको डराते रहे। मेरी बात में विश्वास नहीं हो रहा है ना तो खुद से देख लीजिये:-


                     
अब हुआ विश्वास? :) हमें समझ आ गया था के ज़्यादा देर यहाँ रुकना ठीक नहीं है। बस फिर क्या था हम थोड़ा घूमें और फिर निकल पड़े वेगास के लिए। कुछ तसवीरें ली थी मैंने वो आपके साथ शेयर करती हूँ। 





जो मुझे वहाँ सबसे ज़्यादा पसंद आया वह था Mesquite Sand Dunes और Zabriskie point.ऐसी बंजर भूमि को देखने के बाद वेगस पहुँच कर ऐसा लग रहा था मानो जैसे हम कलयुग के स्वर्ग में हों। अलग ही दुनिया थी वो भी। वहाँ के किस्से कभी और सुनाऊँगी।

बुधवार, 2 सितंबर 2015

संत की परिभाषा।

साधु कौन होते हैं? क्या हम किसी को भी साधु बना सकते हैं? क्या हम खुद भी साधु बन सकते हैं? आज-कल के हाल को देख कर तो यही लगता है कि भारत में धर्म,आस्था व विश्वास के नाम पर कैसे लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। इस संसार में कई धर्म हैं जिनके अनुयायी उस धर्म का पालन करते हैं तथा दिल से उसकी पूजा करते हैं। अगर में हिंदू धर्म की बात करुँ तो हमारे धर्म में ३३ करोड़ देवी देवताओँ  को पूजा जाता है। अब अगर कोई व्यक्ति इन देवी देवताओँ  के नाम से हमें मूर्ख बनाएगा तो क्या होगा? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। चलिए पहले तो मैं आपको बताती हूँ कि साधु की परिभाषा क्या होनी चाहिए ।
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वह धार्मिक, परोपकारी, सदाचारी व्यक्ति हो जो धर्म, सत्य आदि का उपदेश देकर सम्पूर्ण मानव जाति व जीव जंतुओं एवं वनस्पति के कल्याण की बात सोचता हो,उसे साधु कहना ठीक होगा। वह व्यक्ति जो सांसारिक प्रपंच छोड़कर त्यागी और विरक्त हो गया हो उसे साधु  कहना ठीक होगा। जिसमें कोई आपत्तिजनक बात या दोष न हो तथा बहुत ही शांत भाव से रहने वाला सदाचारी और सुशील व्यक्ति को ही साधु कि संज्ञा दिया जाना उचित होगा। अन्धविश्वास से भरी इस दुनिया में पता नहीं हमें क्या-क्या देखना पड़ सकता है। मैं यह नहीं कहती कि ईश्वर नहीं है।  हमारे यहाँ तो अगर किसी पेड़ के नीचे एक पत्थर को भी रख उसमें टीका,चावल लगा कर फूल व कुछ पैसे चढ़ा दिए जाएं तो जो भी व्यक्ति वहां से गुज़रेगा वह अपना सर एक बार अवश्य ही झुकाएगा; ऐसी है हमारी आस्था। पर आज-कल कुछ लोग इसी बात का फायदा उठा रहे हैं और ईश्वर के नाम पर अपनी दुकानें  चला रहे हैं। चलिए अब मैं आपको एक कहानी सुनती हूँ।

एक गरीब परिवार कि लड़की की शादी एक छोटे-मोटे व्यापारी से हो जाती है। उसके व्यापर से उतनी कमाई नहीं हो पाती जिससे कि वह लोग ख़ुशी से रह सकें। फिर वह लड़की स्वयं छोटे-मोटे कार्य करके अपने घर का खर्चा चलाती है। उसके पति को यह सब अच्छा नहीं लगता और वह काम की तलाश में दूसरे शहर नौकरी ढूंढने निकल पड़ता है। कालांतर में वह लड़की एक बाबा के संपर्क में  आती है तथा उससे ६ अथवा ८ महीने दीक्षा लेने के उपरांत स्वयं को माँ दुर्गा का अवतार बताने लगती है और उसकी आड़ में लोगों को भ्रमित कर करोड़ों की संपत्ति जुटा लेती है। है न पूरी फ़िल्मी कहानी !

अब सवाल यह उठता है कि क्या इसको दुर्गा माँ का रूप समझना ठीक होगा? इसी प्रकार के अनेक द्रष्टान्त वर्तमान में अक्सर देखने को मिल जाते हैं। पर जब इन बड़े-बड़े,पढ़े-लिखे,पैसे वाले लोगों को इस प्रकार के साधु और साध्विओं  की पूजा करते हुऐ देखती हूँ, उनके नाम के भजनों में झूमते देखती हूँ तो ह्रदय को काफी कष्ट होता है। अपने प्रवचनों के दौरान इस प्रकार के साधु व साध्वी कहते हैं कि अमुक धनराशि दोगे तो सीधे स्वर्ग में बुकिंग हो जाएगी अथवा व्यापर में लाभ होगा या बहुत दिनों से रुके हुए सारे सामाजिक कार्य पूर्ण होजाएंगे आदि आदि.…… ।  अरे! ऐसा भी कहीं होता है, पूजा ही करनी है तो अपने माँ-बाप व बुजुर्गों की पूजा करो,उनका आशीर्वाद ही मिलेगा। उनकी व जरूरत मन्दों की सेवा करने से ही स्वर्ग प्राप्ति के साँथ-साँथ सारे सांसारिक कार्य भी सिद्ध होंगे। अतः मेरा यह मत है कि अकारण अन्धविश्वास में न फँस हमें अपने-अपने धर्मों के अनुसार बताये गए भक्ति मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए तथा यथा संभव मानव कल्याण के लिए कार्य कर इस जन्म में मिले अपने अमूल्य मानव जीवन को सफल बनाना चाहिए।

महामण्डलेश्वर, धर्मगुरु, पंडित व हर वो व्यक्ति जो धार्मिक हो उसे हमारे देश में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। मैं यह नहीं कहती कि सभी संत एक से हैं, अच्छे और बुरे हर तरह के इंसान होते हैं इस दुनिया में पर यदि कोई व्यक्ति दावा करने लगे की वह देवी-देवता का रूप है तो यह बात मेरी समझ से परे है।

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रविवार, 30 अगस्त 2015

बचपन की यादें, भाई और मैं - 2

उबले अंडे का एक किस्सा और याद आ गया। बचपन से ही हमें सवेरे उठते ही २ उबले हुए अंडे खाने और १ गिलास दूध पीने की आदत थी। माँ के पास छोटी सी अंडे उबालने की बाल्टी हुआ करती थी जिसमे अक्सर अंडे आपस में टकरा कर टूट जाया करते थे। अब प्रश्न यह उठता था के वह टूटा अंडा खाएगा कौन? तो माँ हमें समझती थी कि कोई भी खालो अंडा तो टूट कर ही पेट में जायेगा। पर हम तो बच्चे थे हमारे समझ में कहाँ कुछ आना था। अकसर जब स्कूल की छुट्टी होती थी तब मैं और भाई आराम से उठते थे। ब्रश करके जब हमें माँ अंडे देती थी तो मेरी पूरी नज़र उसके अंडे पर रहती थी। वह अपना एक अंडा भी खा नहीं पाता था और मेरे दोनों अंडे पेट में होते थे। इतना सीधा तो वह भी नहीं था कि मैं उसका हिस्सा मांगू और वह बिना कुछ कहे ख़ुशी-ख़ुशी मुझे देदे। फिर मैंने एक खेल का अविष्कार किया जिसका नाम था टैन्ट-टैन्ट। इसमें हम एक कम्बल में टॉर्च लेकर बैठते थे। ऐसा लगता था जैसे हम टैन्ट में बैठे हों। फिर हम उसी में अपने उबले अंडे खाते थे। मेरा अंडा खत्म होने पर मैं चिड़िया बन जाती थी और उसको बोलती थी कि चिड़िया को भूख लगी है, कुछ खाने को मिलेगा? तभी वह अपने अंडे से थोड़ा सा हिस्सा मेरी चोंच में डाल देता था। वह मुझे अंडे का सफ़ेद भाग देता था जो मुझे आज भी अच्छा नहीं लगता। मैं उसे बोलती थी कि चिड़िया का पेट पीले वाले से ही भरता है तो वह मुझे चिड़िया का बच्चा समझ अपना पूरा अंडा खिला देता था। कुछ सालों बाद वह बड़ा होने लगा। अब उसे पता था के कोई चिड़िया-विडिया नहीं होती। अब उसे आसानी से उल्लू बनाना थोड़ा मुश्किल था। पर थी तो मैं भी उसकी दीदी ही। अब मेरे पास दूसरी योजना थी। मुझे पता था कि जो भी चीज़ मुझे अच्छी लगती है वह उसे भी पसंद होती है। जैसे अगर मैं  कहूँ मुझे चाय बहुत पसंद है तो उसे भी चाय पसंद हो जाएगी। जो कुछ भी मुझे पसंद और चाहिए होता था उसे भी वही चाहिए होता था। इसी बात का फायदा उठाते हुए मैंने उसे बोला के मुझे तो अंडे का सफ़ेद हिस्सा बहुत अच्छा लगता है। तभी वह बोला मुझे भी। मैं भी उसका यही जवाब एक्सपेक्ट कर रही थी। बस फिर क्या था भाई के लिए मैंने त्याग किया और अपना सफ़ेद वाला भाग उसके पीले भाग से बदल लिया। कुछ साल यह भी चला पर फिर वह सच में बड़ा हो गया था। अब मेरा अंडा ख़तम होने पर वह मुझे चिढ़ा-चिढ़ा के खाता था। बोलता था "चिड़िया को अंडा चाहिए ये ले" और अपने मुँह में डाल लेता था। :(

बचपन की यादें, भाई और मैं - १

सर्दियों के दिन थे। दिसम्बर का महीना चल रहा था। स्कूलों में छुट्टियाँ हो गई थी। यह महीना मुझे बहुत पसंद था क्योँकि हर बार की तरह इस बार भी हमलोग छुट्टियों में अपने पिताजी के पास जाने वाले थे पर माँ की एक शर्त थी कि वह हमें लेकर तभी जाऐगी जब हम सारा सर्दियों का होमवर्क आने वाले १० दिनों में पूरा करें। ऐसा सुनते ही मैंने तो काम करना शुरू किया लेकिन मेरा भाई आलसी राम था। उसका सारा होमवर्क मुझे ही करना पड़ता था। पहले अपना काम करो फिर उसका। उसके छोटी क्लास में होने के कारण  उसे जोड़-घटाना और निबंध लिखने को ही दिया जाता था पर यह काम भी वह आलसी नहीं करता। उसके चित्रों से लेकर सारे प्रोजेक्ट्स मैं ही बनाती थी। समस्या तो यह थी कि जब उसका स्कूल खुलने वाला होता था बस तभी उसे होश आता था। फिर उसका रोना चालू और माँ मुझे उसकी मदद करने को बोलती थी। उसकी कामचोरी का एक किस्सा बताती हूँ-

वह कक्षा ६ में था। स्कूल खुलने मैं दो दिन बाकी थे। वह रोते-रोते मेरे पास आया और बोला "दीदी, (यह शब्द तभ बोला जाता था जब कोई काम हो ) मेरा काम करदे नहीं तो मिस बहुत मारेगी"। इतनी सीधी तो मैं भी नहीं थी जो बिना कुछ लिए ही उसका काम कर दूँ। मैंने बोला मैं एक ही शर्त में तेरा काम करुँगी जब तू मुझे रोज एक हफ्ते तक अपने बॉयल्ड एग का पीला वाला भाग देगा। है तो छोटा भाई ही।  बुरा तो लग ही जाता है।  वैसे भी फ्री में कोई काम नहीं होता। पूछने पर पता चला उसे इंग्लिश विषय मैं ३०० पन्नों  की एक कॉपी भरनी थी। दो दिन बैठ कर मैंने जैसे-तैसे २५० पन्ने लिखे। बाकि बचे पन्नों  को भरने का समय नहीं था। उसने ५० बचे पन्ने  फाड़ दिए। बोलने लगा कौनसा मिस पन्ने गिनेगी। थैंक्स कह कर चल दिया। अब तो वह बहुत बड़ा हो गया है। कितना भी बड़ा हो जाऐ रहेगा तो हमेशा मुझसे छोटा ही। कुछ दिन पहले उसका फ़ोन आया था। बहुत खुश था। उसे उसकी कंपनी में अच्छा काम करने के लिए २ अवार्ड्स मिले हैं। भगवान  करे ऐसे ही तरक्की करता रहे। स्वस्थ रहे, सुखी रहे और क्या चाहिऐ।
                                        

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

ये सूतक-नातक क्या है, ये सूतक-नातक ?

सूतक के बारे में तो मैं बचपन से ही जानती थी पर नातक  के बारे में मुझे नहीं पता था। अभी आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं किस बारे में बात कर रही हूँ। हिन्दुओं मैं यह मान्यता है  कि यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो उसे सूतक लगना कहते हैं। यदि कोई बच्चा पैदा होता है तो उसे नातक लगना कहते हैं।

सूतक वह अवधि है जिसमें परिवार का कोई भी सदस्य तथा रक्त-सम्बन्धी कुछ दिनों तक पूजा-पाठ नहीं कर सकता और ना ही उसे किसी मंदिर में जाने की अनुमति होती है। इसके पीछे का तर्क मुझे समझ आता है। इसमें हम मंदिर न जाकर उस सदस्य को खोने का दुःख व्यक्त करते हैं। भगवान से मन ही मन उसकी आत्मा की शांति मांगते हैं। हमारे यहाँ खाने मैं हल्दी डालना शुभ माना जाता है। लेकिन सूतक लगने पर तीन दिन बिना हल्दी का खाना बनाया जाता है।

पर यह तर्क मेरे समझ से बाहर है कि क्यों किसी बच्चे के जन्म को अशुद्ध माना जाता है। यह तो ख़ुशी की बात होनी चाहिए कि आपके परिवार में एक छोटी सी या छोटा सा सदस्य शामिल हुआ है। क्यों यह लोग माँ और बच्चे को नामकरण होने तक सबसे दूर रखते हैं? किसी भी अन्य सदस्य को उन्हें छूने नहीं देते। मानती हूँ हमारे पूर्वज बड़े बुद्धिमान थे। पहले के समय में चिकत्सा सुविधाएं उतनी अच्छी नहीं थी जितनी अभी हैं। हो सकता है उन्हें लगता हो ऐसे माँ और बच्चे को वायुवाहित बिमारियों एवं संक्रमण से बचाया जा सकता है। पता नहीं कुछ भी हो सकता है।

यह सब मैं इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि मेरी पांच ही नवरात्री हुई थी कि मेरे पापा के चचेरे भाई के वहां बच्चा हो गया और हमें नातक लग गया :( । मुझे समझ नहीं आया कि बच्चा होने की ख़ुशी मनाऊँ या नवरात्री न पूरी कर पाने का गम। 

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

केक कलैक्शन

मुझे मालूम है आपको मेरे इस पोस्ट का शीर्षक कुछ अटपटा सा लग रहा होगा। अभी आप यह सोच रहे होंगे की यह केक कलैक्शन क्या बला है और केक को कोई कलेक्ट कर कैसे सकता है? आपने कॉइन,करेंसी , डाक टिकट इत्यादि कलैक्शन सुने होंगे लेकिन केक कलैक्शन नहीं। चलिए अब मैं बता ही देती हूँ। दरअसल बचपन से मुझे भी सबकी तरह अपने जन्मदिन का इंतज़ार रहता है। बचपन में भी मेरा जन्मदिन बड़ी धूम धाम से मनाया जाता था और आज भी। तब मेरे माँ-बाबा मेरा जन्मदिन मानते थे और अभी मेरा पति। इज़्ज़त देते हुए लिखती "मेरे पति" तो लगता एक से ज्यादा हैं। :)

मैं केक का संग्रह अपने द्वारा खींचे गए केक के चित्रों के रूप में करती हूँ। मेरे जन्मदिन में मुझे सबसे ज्यादा ख़ुशी केक काटने से ही मिलती है। कुछ और हो या न हो केक का होना ज़रूरी है। नीचे कुछ तस्वीरें है जो मैं आप लोगों के साथ बाँटना चाहती हूँ।
बर्थडे केक।
बर्थडे केक।
बर्थडे केक।
बर्थडे केक।
वैलेंटाइनस डे केक।

एनिवर्सरी केक।


तिथि वाला केक।
अभी आप सोच रहे होंगे ये तिथि वाला केक क्या है? हमारे यहाँ पहले से ही जिस तिथि में मैं पैदा हुई थी उसी दिन हर साल मेरा जन्मदिन मनाया जाता है। पर मुझे ये तिथि कभी समझ नहीं आती थी।मैं अपना जन्मदिन उस एक तारीख को मनाना चाहती थी जब मैं पैदा हुई पर बड़ों की दुनिया मैं बच्चों की चलती कहाँ है। मेरी किसी भी दोस्त को मेरा जन्मदिन याद नहीं रहता था क्योँकि तिथि तो ऊपर नीचे होते रहती है।शादी के बाद भी मेरी माँ ने जब मुझे जन्मदिन की बधाइयाँ दीं तब मुझे मेरा तिथि वाला जन्मदिन याद आया।फिर क्या था जैसे ही पति देव को पता चला उन्होंने बड़ी धूमधाम से मेरा जन्मदिन मनाया। अब यह तो पक्का था जब तारीख वाला जन्मदिन आएगा तो वह ज़ोर शोर से मनाया जायेगा पर उस दिन पति देव घर पर थोड़ा लेट आए और बोले उन्हें एग्गलेस केक नहीं मिला।कुछ तो था उनके हाथ में जो मुझे दिख नहीं रहा था।शायद वो मुझसे छिपाने की कोशिश कर रहे थे। मुझे पता था केक तो लाये होंगे पर अचानक से उन्होंने मुझे मफ़्फ़िन्स का पूरा एक पैकेट पकड़ा दिया और बोले आज इसी से काम चलाना  पड़ेगा। अभी भी कही एक उम्मीद तो थी।लग रहा था शायद यह सब मज़ाक ही है पर जब उन्होंने उन मफ़्फ़िन्स पर कैंडल लगाने शुरू किये तो विश्वास हो गया था कि यही काटने होंगे। :(
  बाद में जब उनके फ्रेंड्स केक लेकर आये तो पता चला ये सब मज़ाक था :)असली केक तो ये था ---
खूब सारे गुलाबों  के साथ


वह दिन बहुत ख़ास बनाया गया मेरे लिए।रात के भोजन के लिए हम सभी लोग ओलिव गार्डन गए। बहुत सारे उपहार मिले।बचपन से आज तक हर साल के नाम पर एक गिफ्ट मिला। तब मैंने मन ही मन सोचा काश मैं ४० साल की होती तो ४० गिफ्ट तो पक्के थे। :)

रविवार, 10 अगस्त 2014

स्वतंत्रता दिवस या देशभक्तों को याद करने का दिन ?

१५ अगस्त का दिन मात्र देशभक्तों को याद करने का दिन ही रह गया है। यह दिन भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। मुझे आज भी याद है बचपन में १५ अगस्त के दिन प्रिंसिपल सर झण्डा रोहण कर भाषण दिया करते थे। उस गर्मी में भाषण सुनने का मन किसका करता, सबकी नज़र उस पेटी में टिकी रहती जिसमें बूंदी के लड्डू होते थे। बहुत सारे कार्यक्रम होते। अंत में लड्डू लेकर हम सभी अपने-अपने घर को चले जाते थे। आस-पड़ोस में भी सिर्फ देशभक्ति के गीतों की गूंज ही सुनने को मिलती थी और घर पर भी दूरदर्शन में सिर्फ देशभक्ति की फिल्में ही चलती थी। जष्न तो हम लोग बहुत ज़ोर शोर से मानते हैं पर दूसरे ही दिन से यह जोश हमारा ठंडा क्योँ हो जाता है? एकतरफ वो लोग थे जिन्होंने अपना खून बहा कर देश को आज़ाद कराया और दूसरी तरफ हमलोग हैं जो सिर्फ सोशियल साइट्स तक ही सीमित रह गए हैं। आज ही मेरे whatsapp पर एक मैसेज आया जिसमें लिखा था "आज १० अगस्त है और १५ अगस्त तक इस इंडियन फ्लैग को अपनी whatsapp  pic  बनाऐं प्लीज" ये देखिये हमारे झण्डे को व्हाट्सप्प और फेसबुक जैसी सोशियल साइट्स में युवाओं द्वारा सम्मान दिया जा रहा है।
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मुझे एक बात समझ नहीं आती १५ अगस्त तक ही क्यों?  भारत स्वतंत्र तो हो गया लेकिन अभी भी उसके सामने देश के निर्माण का कार्य चल रहा है और न जाने कब तक यूँही चलता रहेगा। महिला होने के नाते मेरा फ़र्ज़ बनता है की महिलाओं की स्वतंत्रता का भी ज़िक्र किया जाये। हमारे देश में महिलाओं की स्वतंत्रता व सुरक्षा का विषय तो पहले से ही चर्चा में रहा है। मैं इस बारे में ज्यादा तो कुछ बोलूँगी नहीं बस कुछ हेडलाइंस शेयर करना चाहूँगी जिससे आप लोग भारत में महिलाओं की स्थिति का अंदाज़ा लगा सकेंगे। तो ये रहीं हेडलाइंस :--
१-मीरा रोड गैंगरेप केस में सातवें आरोपी का भी सरेंडर। 
२-यूपी: पुलिस स्टेशन में महिला के साथ गैंग रेप। 
३-गैंग रेप पीड़िता के परिजनों से पुलिस ने मांगी रिश्वत। 
४-सातवीं की छात्रा से रेप, पुलिस ने शिकायत फाड़ थाने से भगाया--इसकी अंतिम पंक्तियों में लिखा था "पीड़िता ने आरोपी और अभद्र व्यवहार करने वाले थाना इंचार्ज की शिकायत युपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भेजी है।" उसके नीचे किसी ने कमेंट किया "गुंडों की सरकार कुछ नही करेगी"।
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देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, अराजकता, बेरोजगारी, भूखमरी और गरीबी की वजह से अनेक लोगों के लिये १५ अगस्त की आज़ादी एक भूली बिसरी घटना हो गयी है। इसके ज़िम्मेदार कुछ हद तक हमलोग ही तो हैं। देखते है अब यह नई सरकार क्या रंग लाती है इस सरकार से बहुत लोगों की ढ़ेर सारी उम्मीदें जुड़ी हैं और यह भी देखने लायक होगा कि सही माईने में कब हमें हमारी आज़ादी मिल पायेगी।

जय हिन्द। 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

कुछ देर की शांति|

मुझे पहले से ही लोगों के जन्मदिन भूलने की बिमारी  है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैं अपनी बेस्ट फ्रेंड के पति का जन्मदिन भूल गई। यहाँ पर दिनों का तो कुछ पता ही नहीं चलता  बहुत जल्दी निकलते है। ऊपर से अगर वीकेंड चल रहा हो तो फिर कहा कुछ याद रहता है। बहुत डाँठ पड़ी और पड़नी भी चाहिए थी आंखिर गलती भी तो मेरी ही थी। इसी बात पर एक किस्सा याद आ गया थोड़ा पुराना है पर किस्सा तो किस्सा होता है क्या नया क्या पुराना।

 २००५ की बात है पढ़ाई पूरी होने में बस अब कुछ ही महीने बचे थे और ये ट्रेनिंग पता नहीं कहा से बीच में आ टपकी।यह भी ज़रूरी थी नहीं तो इतने सालों की मेहनत  मिट्टी  में मिल जाती । एक तरफ ट्रेनिंग की टेंशन और दूसरे तरफ पिताजी को मानाने की। अपने शहर में कंपनियों  के आभाव के कारण ये तो निश्चित था के जाना बाहर ही है पर ये भी पता था के मंजूरी मिलना इतना आसान नहीं। खैर जैसे तैसे मंजूरी मिली और हम निकले दिल्ली की तरफ। पिताजी के राज़ी होने का कारण वो रिश्तेदार थे जो दिल्ली में रहते थे और जिनके वहाँ वो मुझे रखने वाले थे। पिताजी का मानना  था के मैं रिश्तेदारों के वहाँ सुरक्षित रहूंगी। सफर काफी अच्छा था खूब खाते पीते हम लोग उनके घर पहुँचे। उन लोगों ने हमारी काफी खातिरदारी की। फिर वो समय आया जिसमे पिताजी ने अपने वहाँ आने का कारण  बताया। बस मानो सामने वाली पार्टी को साँप  सूँग गया हो। कुछ देर की शांति के बाद वहाँ से एक आवाज़ आई के यहाँ पर होस्टल्स और पी जी बहुत सारे हैं इसकी कम्पनी  के पास देखियेगा  इसका आने जाने का टाइम बच जायेगा। वैसे देखा जाये तो उनका कहना भी कुछ गलत नहीं था। लड़की की ज़िम्मेदारी अपने में ही बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है और जहाँ दूसरे की लड़की की बात आती है वहाँ पर लोग थोड़ा घबराते ही हैं ऊपर से जगह अगर दिल्ली हो तो हो गया काम।
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पिताजी तो घबरा ही गए किसी बहाने मुझे बाहर बुलाया और कहने लगे चलो वापस कोई ट्रेनिंग नहीं करनी है । मैं तो डर  ही गई थी कुछ समझ नही आ रहा था क्या करुँ। बस अब रोना निकलने ही वाला था के अंदर से माताजी की आवाज़ आई "खाना खाने आओ सभी फिर चलते है हॉस्टल देखने " पिताजी मेरे साथ ही खड़े थे बोले" भगवान से प्राथना कर की  कोई अच्छा हॉस्टल मिल जाये वरना पी जी में मैं तुझे नहीं रखने वाला । मुझे पी जी सुरक्षित नहीं लगता। " फिर क्या निकल पड़े हॉस्टल ढूँढने। आखिरकार  उन्हें ऐसा हॉस्टल मिल ही गया जिसकी वोडेन इन्सान  नहीं हिटलर थी। यही वो हॉस्टल था जहा लाइफ में पहली बार मैं अपना जन्मदिन भी भूल गयी।मेरा जन्मदिन मेरे लिए बहुत विशेष होता है। दो महीने पहले से में हल्ला करने लगती हूँ कि मेरा जन्मदिन आने वाला है। पता नहीं एक अजीब सी ख़ुशी होती है जो मैं लिख कर व्यक्त नहीं कर सकती पर अगर वही इन्सान अपना जन्मदिन भूल जाये तो क्या हो? मेरे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। मैं सवेरे ८ बजे चली जाती थी और रात के ७:३० बजे घर पहुँचती थी। बहुत जादा व्यस्त रहती थी इसीलिए शायद भूल गयी थी। लेट आती थी इसलिए जल्दी सो जाती थी। जन्मदिन पर रात में सबसे पहला कॉल मेरे घर से ही आया मुझे तो याद ही नहीं था। मैं सो रही थी कि अचानक फ़ोन की आवाज़ से नींद खुली। समझ नहीं आरहा था इतना लेट इन लोगों ने क्योँ कॉल किया। खैर मैंने झट से फ़ोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई "हैप्पी बर्थडे टू यू-२ हैप्पी बर्थडे डिअर। ……मीनुली , हैप्पी बर्थडे टू  यू " ये पहाड़ियों की नाम बिगाड़ने  की आदत बड़ी बुरी होती है। दादी के वक्त से यह प्रथा चली आ रही है। अगर आपका नाम अ ,आ  से शुरू होता है तो आपका नाम अनुली पड़ने की बहुत अधित सम्भावना है।ऐसे ही अगर आपका नाम अन्य किसी भी अक्षर से हो, तो उसके पीछे इनुली  लगा कर आपका नाम और सुन्दर बन सकता हैं उदाहरण के लिए परुली, गीतुली ,धनुली, मीतुली इत्यादि। अगर आप महिला हैं  तो आप भी अपने नाम के पीछे इनुली का प्रयोग कर सकती है,देखिये क्या बनता है।  :)

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका - जितना बड़ा नाम उतना बड़ा देश।

 बैंगलोर से सैन फ्रांसिस्को के लिए हमारी कनेक्टिंग फ्लाइट थी - बैंगलोर से हॉंगकॉंग, हॉंगकॉंग  से सैन फ्रांसिस्को। लग रहा था लाइफ मैं बहुत कुछ बदल रहा है। मैं बहुत खुश थी मुझे विदेश घूमने का अवसर मिल रहा था पर साथ ही थोड़ा सा डर भी था..... वैसे तो वीज़ा के लिए इंटरव्यू क्लियर हो ही गया था पर मेरे पति ने बताया कि सैन फ्रांसिस्को में भी एक छोटा सा इंटरव्यू होता है और डाक्यूमेंट्स पूरे  न होने पर वहाँ से भी लोगों को वापस भेज दिया जाता है। शायद वो मुझे डरा रहे थे। पर अब मैं किसी से डरने वाली नहीं थी क्योँकि मैं अमेरिका में थी। जैसे ही सैन फ्रांसिस्को एयरपोर्ट  से बाहर  निकले एक अफ्रीकन अमेरिकन अपनी काली रंग की लम्बी सी गाड़ी का दरवाजा खोले हमारे स्वागत में खड़ा था। वह काले रंग की लम्बी सी गाड़ी और कोई नहीं लिमोजीन थी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था मैं इसमें बैठने वाली हूँ। मैंने टीवी में अमेरिका के प्रेसिडेंट बराक ओबामा को इसमें बैठे, हाथ हिलाते हुए देखा था। मैंने अपने पति की ओर  देखते हुए कहा शायद ये कुछ गलत समझ रहा है। पतिदेव मुस्कुराए और बोले "बैठो, तुम्हारे लिए ही दरवाज़ा खोला है।" उस वक्त मैं बहुत भावुक को गई थी कैसे ही मैंने अपने आँसू  रोके और बैठ गई। आह! क्या शानदार गाड़ी थी। वैसे कहा जाए तो गाड़ी नहीं चलता फिरता बार था वो। ऐसी गाड़ी पर मैं पहले कभी नहीं बैठी थी। गाड़ी तो बहुत बड़ी थी पर उसमें बैठने वाले हम दो ही थे। ऐसे मौकों में अपनों की बहुत याद आती है। हम दोनों के परिवार इसमें एक साथ आ सकते थे।

मैं लिमोजीन में बैठ कर गाड़ी का आनन्द ले ही रही थी कि अचानक मैंने अपने पति के चेहरे पर घबराहट सी देखी। वो अपने लैपटॉप बैग में कुछ ढूंढ रहे थे। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि  उनका बटुआ नहीं मिल रहा है। उनके कहने की देरी थी और मुझे वह फिल्मी दृश्य याद आने लगा जिसमे हीरो अपनी गर्लफ्रेंड को पहली बार डेट में लेकर जाता है और बिल देते वक़्त उसे पता चलता है की वह अपना बटुआ कहीं भूल आया है। या जब आप खाने के लिए किसी भोजनालय पर जाए और पैसे देते वक़्त आपको पता चले कि आपका बटुआ चोरी हो गया है .……तो क्या होगा?
वो आपको बर्तन धोने के लिए बोलेंगे या कुछ और? पर यहाँ का तो दृश्य ही कुछ अलग था। हम अमेरिका में एक शानदार सी गाड़ी लेमो में बैठे थे और पास में बटुआ नहीं।  मेरे पास कुछ इंडियन करेंसी थी जो यहाँ पर किसी काम की नहीं थी। सारे पैसे, कार्ड्स सब उसी बटुए में थे। मुझे तो अपने आगे जेल की सलाखें दिखाई दे रही थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या होगा। सैन फ्रांसिस्को के हवाई अड्डे में तो मैंने इनके पास वो बटुआ देखा था। ड्राइवर साहब भी हवा की तेजी से गाड़ी को भगा रहे थे। उनसे कहने में डर तो लग रहा था पर अब और कोई चारा भी नहीं था।

बचपन में मैंने सुना था कि अगर आपकी कोई चीज़ खो जाए तो अपने दुपट्टे पर एक गाँठ बांध लेनी चाहिए, गाँठ बाँधने से वह चीज़ मिल जाती है। मैंने कभी ऐसी बातों पर विश्वास नहीं किया पर पता नहीं क्योँ उस समय लगा एक बार इसे आज़माने में हर्ज़ ही क्या है। पर क्योँकि में अमेरिका में थी तो दुपट्टा कहाँ से लाती? मैंने जीन्स पहनी थी।  फिर मैंने एक नज़र अपने पर्स में डाली और देखा कि उसमें एक रुमाल पड़ा था।  सोचा यह भी तो कपड़ा ही है शायद काम कर जाए.……

एक बात तो माननी पड़ेगी यहाँ के लोग बहुत ईमानदार होते हैं। अगर यह हादसा भारत में किसी हवाई अड्डे पर हुआ होता तो बटुआ मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। वहाँ खोने पर आदमी नहीं मिलते बटुआ न मिलना तो छोटी सी बात है। क्योंकि हम अमेरिका में थे तो हमें हमारा बटुआ जैसा था वैसा ही मिल गया। हमारे वापस हवाई अड्डे जाते ही मेरे पति का नाम एनाउंस हो रहा था। इनका नाम सुनते ही मुझे लगा अब "बर्तन नहीं धोने पड़ेंगे।" :)

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मेरी पहली हवाई यात्रा - 2

अब मेरे और विमान के बीच में एक एयरबस की ही दूरी रह गयी थी जो हमें ले जाने के लिए विमान दौड़ पट्टी पर हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। वैसे तो मुझे बस की सवारी कुछ खास पसंद नहीं पर आज सब कुछ अच्छा लग रहा था। विमान में पहुँचते ही मैंने एक लम्बी सी चैन की साँस भरी और झट से जाकर खिड़की के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई। सुरक्षा पेटी लगा अब मैं जहाज़ के उड़ने का इंतज़ार करने लगी क्योंकि अब मैंने जहाज़ को भीतर से तो देख लिया था परन्तु अभी भी ऊंचाई से ज़मीन देखने की इच्छा थी।

उड़ने से पहले ही विमान में एयर होस्टेस आ गयी। पहले तो उन्होंने सबकी सीट बेल्ट देखी और फिर डेमो दिया कि किस तरह से सीट बेल्ट बांधनी है और किस तरह से हवा का दबाव कम होने पर उपर से मास्क खुद निकलकर आता है जिसे मुंह पर लगाकर आप सांस ले सकते हो। उसके बाद उन्होंने बताया कि लाइफ जैकेट जो कि विमान की सीट के नीचे होती है उसे कैसे पहनना है। तभी मेरे पति ने मुझसे एक प्रश्न किया। उनका प्रश्न था कि यदि माँ अपने बच्चे के साथ यात्रा कर रही है और तभी ऐसा कुछ होता है तो उसे किसे पहले बचाना चाहिए, अपने बच्चे को या खुद को? मेरा जवाब था बच्चे को। शायद मेरी जगह कोई भी होता वह यही जवाब देता। पर मैं गलत थी। उन्होंने बताया के दूसरों की मदद करने से पहले अपनी मदद करनी चाहिए।

विमान अब रनवे पर बड़ी तेजी से भागे जा रहा था। मैं बस उसके उड़ने का इन्तेज़ार कर रही थी। अचानक से देखते ही देखते वह उड़ने लगा। वाह! क्या नज़ारा था। कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिसे आप सिर्फ महसूस कर पाते हैं और वह हमेशा के लिए आपके दिल व् दिमाग में छप जाते हैं।  यह नज़ारा भी कुछ ऐसा ही था। ऐसा लग रहा था मानो मैं उड़ रही थी। मैं सच में हवा में थी। जैसे जैसे विमान की दूरी धरती से बढ़ती जा रही थी वैसे वैसे पूरा शहर छोटा होता जा रहा था। इतना सुन्दर नज़ारा मैंने आज से पहले कभी नही देखा था। देखते ही देखते अब मैं बादलों  के ऊपर थी।सच में बादलों  के ऊपर होने का अनुभव ही सबसे अलग अनुभव होता है। यह अनुभव आप भी नीचे दी गयी तस्वीर से ले सकते हैं।
अभी आपलोग सोच रहे होंगे के इंडिया में ऐसा नज़ारा कहा देखने को मिलता है तो आपकी जानकारी के लिए बता दूँ यह तस्वीर भारत की नहीं है। उस दिन तो मैं बहुत खुश थी इसलिए कोई भी तस्वीर नहीं ले सकी । यह तस्वीर मेरी दूसरी हवाई यात्रा की है जो विदेश की थी। इसके बारे में आपको अगले पोस्ट में बताती हूँ।  :)

सोमवार, 7 जुलाई 2014

मेरी पहली हवाई यात्रा - 1

यह यात्रा भी बड़े मज़ेदार थी। आज तक साइकिल, कार, स्कूटर, बस, ट्रैन, ऑटो इत्यादि द्वारा सभी प्रकार की यात्रायें  की थी परन्तु वायु द्वारा यात्रा कभी नहीं की। जब भी कोई हवाई जहाज़ सर के ऊपर से गुज़रता तब मैं आसमान  की ओर  देखते हुए खुद से यह प्रश्न करती कि क्या कभी मैं भी इसमें बैठ पाऊँगी? जब वह मेरी आँखों से ओझल हो जाता तब मैं सर नीचा कर मुस्कुराती और अपने कार्य में पुनः लग जाती।

जिसने कभी हवाई अड्डा न देखा हो वह अब हवाई जहाज़ पर बैठने वाली थी। डर तो था ही परन्तु साथ ही में एक प्रकार का जोश भी था जो शायद मेरे चेहरे पर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था। मैं सच में बहुत खुश थी। जिसे मैं हमेशा अपने सर के ऊपर आसमान  में उड़ता हुआ देखती थी अब मुझे उसमें बैठने का सौभाग्य प्राप्त होने वाला था।

आखिरकार हम अपने खूब सारे सामान के साथ हवाई अड्डे में पहुंच चुके थे। सामने प्रवेश द्वार में दो गार्ड्स खड़े थे जो सभी के टिकट व पार-पत्र (पासपोर्ट)  की जाँच कर रहे थे।  अब हमें भी प्रवेश मिल गया था। अभी मेरे सपनों के विमान को उड़ने में दो घंटे बाकि थे तभी मेरे पति बोले चलो तब तक अपने आगमन की सूचना दे देते हैं। अगर आपको मेरी यह बात समझ न आई हो तो मैं चेक-इन करने की बात कर रही थी। :) जरुरत से जादा सामान होने पर जैसे-जैसे भार बढ़ा वैसे-वैसे इनका बटुवा हल्का होते गया। 

मेरे लिए तो सब कुछ नया था। पहली बार मैं अपने पति का अनुसरण कर रही थी। यह देख उन्हें भी बड़ा मज़ा आ रहा था।  ऐसा दिखावा कर रही थी मानो मेरा यहाँ आना पहली बार न हो। बोर्डिंग पास मिलते ही अब हमें सुरक्षा जाँच (सिक्योरिटी  चेक - जिसमे आपके साथ साथ आपके सामान की भी जाँच की जाती है) के लिए लाइन में लगना था। यहाँ लड़कों के लिए अलग लाइन व लड़कियों के लिए अलग ही लाइन बनी थी । इतना समझ आ रहा था कि यहाँ से कुछ दूर तक हमारे रास्ते अलग अलग हैं। 

अब मुझपे और मेरे बैग पर सिक्योरिटी चेक्ड का ठप्पा लग चुका था। फिर पता चला सिक्योरिटी जाँच  के बाद वापस नहीं जाने दिया जाता। अतः हम वहीं बैठ अपने जहाज़ का इंतज़ार करने लगे। मुझे रेस्टरूम जाना था। वैसे तो मैं जहाज़  में भी जा सकती थी पर अपने इस डर की वजह से मुझे लगा यहीं जाना ठीक होगा। मैंने अपने पति से सामान देखने के लिया कहा और मैं रेस्टरूम की ओर बढी तो देखा कि वहाँ इतनी भीड़ थी जितनी किसी ब्यूटी पार्लर में भी नहीं होती। कोई बालों को सवार रही थी तो कोई काजल लगा रही थी।  मैं भी सबकी  देखा देखी अपने बालों  को सेट करने लगी। बिना पानी लगाये बाल कुछ स्थिर नहीं हो रहे थे। पानी उस नल में था जिसे मैं खोल ही नहीं पा रही थी। बहुत कोशिशों के बाद पता नहीं कैसे वो नल खुल तो गया पर अब मुझसे वो बंद नहीं हो रहा था। मैंने आज से पहले ऐसे नल देखे थे जो घुमा घुमा कर खोले जाते थे तथा घुमा घुमा कर ही बंद हो जाते थे। पास में खड़ी महिला लिपस्टिक लगा रही थी। शर्मा शर्मी मैंने पूछ ही डाला "ये नल बंद नहीं हो रहा है कैसे बंद करूँ?" वह मुस्कुराई और बोली ऐसे ही छोड़ दो खुद से बंद हो जायेगा। यह मेरे लिए थोड़ा अजीब था पर मैंने भी उसे ऐसे ही छोड़ दिया और देखते देखते वह बंद हो गया। बड़े शहरों की बड़ी बातें। यहाँ नल के नीचे हाथ लगाने से पानी अता है और हटाने से पानी चला भी जाता है।

आगे के तमाम अनुभव अगली पोस्ट में। :) :)

गुरुवार, 26 जून 2014

सप्ताह का अंत और एक नई शुरुआत |

अवकाश का दिन किसे अच्छा नहीं लगता। औरों का तो पता नहीं पर मुझे यह दिन बहुत पसंद है क्योँकि यह दिन और दिनों से अलग होता है। हमारे दिन की शुरुआत देर में उठने से होती है। नाश्ता कर हमलोग घूमने निकल पड़ते हैं। उस दिन मुझे खाना नहीं बनाना पड़ता अतः दोपहर का खाना हमलोग बाहर ही खाते हैँ। कभी सिनेमा देखने चले जाते है तो कभी खरीदारी करने। बस ऐसे ही यह दिन कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता। पर बीते सप्ताह के अंत में अत्यधिक वर्षा के कारण हम बहार न जा सके। ऐसा लग रहा था जैसे यह दिन नष्ट हो रहा हो। मेरी न सही भगवान ने इनकी सुन ली थी। महाशय जी दिन भर बिस्तर में पैर पसार कर फीफा वर्ल्ड कप देख रहे थे। फिर सोचा क्यों न इस दिन को घर में ही रहकर खास बनाया जाए पर कैसे यह समझ नहीं आ रहा था। मुझे कुछ ऐसा कार्य करना था जिसे करने में मुझे ख़ुशी मिले और मेरा दिन अच्छे से बीत जाये तभी बेकिंग करने का विचार दिमाग में आया। मैंने इस दिन से पहले कभी बेकिंग नहीं की थी अतः इसका क्या परिणाम होना है मुझे पहले से ही पता था। :) अगर आप भी इसका परिणाम जानना चाहते है तो नीचे दी गयी इन तस्वीरों को देखें।


यह दुनिया का पहला ऐसा केक था जो कट ही नहीं रहा था । :p :p 

शुक्रवार, 20 जून 2014

कमी

हमने अक्सर यह देखा है जब भी हम किसी कार्य को पहली बार करते हैं तो उसमें कोई न कोई कमी रह जाती है। फिर चाहे बाद में वह कार्य करते करते हम उसमें निपुण ही क्यों न हो जायें। उदाहरण के लिए मेरा पहला ब्लॉग ले लीजिये। मैं हमेशा से चाहती थी कि मेरा पहला ब्लॉग हिंदी भाषा में हो और कुछ हटकर हो। हिंदी भाषा में न लिख पाने के कारण में कुछ निराश सी हो गयी थी। तभी मेरे दिमाग में विचार आया क्यों न रोमनागरी का प्रयोग किया जाये और मैंने अपना पहला ब्लॉग इसी भाषा में लिख डाला। शाम को जब मेरे पति दफ्तर से घर पहुंचे और मैंने उन्हें अपने इस रोमनागरी लिपि में लिखे ब्लॉग के बारे मैं बताया तो उसे पढ़कर वह ठहाके मार कर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया हिंदी भाषा में लिखने का विकल्प इसी में होता है। :( यह सुन में बहुत निराश हो गयी तभी वह मेरी मन:स्थिति का तनाव दूर करते हुए बोले "निराश न हो, अनजाने में ही सही पर तुम्हारा पहला ब्लॉग थोड़ा हटकर ही है "  यह सुन मैं मुस्कुराई :)  और सोचने लगी कैसे इन्होंने मेरी नकारात्मक सोच को आसानी से बदल दिया।